बॉन्ड और डिबेंचर — यील्ड, क्रेडिट रेटिंग और असली जोखिम
बॉन्ड आपको कमाई कैसे देता है, यील्ड टू मैच्योरिटी का असली मतलब क्या है, क्रेडिट रेटिंग कैसे पढ़ें — सरकारी बॉन्ड, PSU बॉन्ड, NCD और डेट फंड की पूरी समझ।
बॉन्ड वह ऋण है जो आप लेते नहीं, देते हैं। आप एक तय अवधि के लिए पैसा देते हैं, तय दर पर ब्याज पाते हैं, और मैच्योरिटी पर मूलधन वापस लेते हैं। यही सादगी बॉन्ड को हर सुरक्षित पोर्टफोलियो की रीढ़ बनाती है — और इसी वजह से इन्हें ग़लत तरीक़े से बेचना भी आसान है। सौदा अच्छा है या नहीं, यह दो संख्याएँ तय करती हैं: यील्ड और क्रेडिट रेटिंग। ज़्यादातर निवेशक दोनों को ग़लत पढ़ते हैं। यह गाइड वही ठीक करती है।
बॉन्ड काम कैसे करता है
हर बॉन्ड की चार बुनियादी बातें होती हैं: फेस वैल्यू (भारत में आम तौर पर ₹1,000 या ₹100), कूपन (फेस वैल्यू पर सालाना ब्याज दर), अवधि और जारीकर्ता। 2031 में परिपक्व होने वाला 7% का ₹1,000 बॉन्ड हर साल ₹70 देता है — आम तौर पर ₹35 की दो छमाही किस्तों में — और मैच्योरिटी पर ₹1,000 लौटाता है। इससे न ज़्यादा, न कम।
"डिबेंचर" वही शब्द है जो भारतीय कंपनी क़ानून कॉर्पोरेट बॉन्ड के लिए इस्तेमाल करता है। नॉन-कन्वर्टिबल डिबेंचर (NCD) अंत तक ऋण ही रहता है; कन्वर्टिबल डिबेंचर शेयरों में बदल सकता है। डिबेंचर सुरक्षित (किसी सम्पत्ति के बदले) या असुरक्षित हो सकते हैं — ऑफ़र दस्तावेज़ में यही एक पंक्ति तय करती है कि कंपनी डूबने पर आपको क्या मिलेगा।
एक बात याद रखें
बॉन्डधारक मालिक नहीं, ऋणदाता है। मुनाफ़े में हिस्सा नहीं मिलता — सबसे अच्छी स्थिति यही है कि भुगतान समय पर हो जाए। इसीलिए बॉन्ड की पूरी जाँच सिर्फ़ एक सवाल पर टिकी है: भुगतान न होने का जोखिम कितना है।
कूपन, करंट यील्ड और यील्ड टू मैच्योरिटी
जारी होने के बाद बॉन्ड बाज़ार में ख़रीदे-बेचे जाते हैं और उनकी क़ीमत बदलती रहती है। जैसे ही क़ीमत ₹1,000 से हटी, कूपन आपका रिटर्न बताना बंद कर देता है। तीन अलग-अलग आँकड़े दिखाए जाते हैं, और प्लेटफ़ॉर्म अक्सर सबसे आकर्षक वाला दिखाते हैं।
| माप | मतलब | उदाहरण (7% बॉन्ड ₹950 में, 5 वर्ष शेष) |
|---|---|---|
| कूपन दर | फेस वैल्यू पर तय ब्याज दर | 7.0% |
| करंट यील्ड | सालाना ब्याज ÷ चुकाई गई क़ीमत | ₹70 ÷ ₹950 = 7.4% |
| यील्ड टू मैच्योरिटी (YTM) | अंत तक रखने पर कुल रिटर्न, ₹50 के पूँजीगत लाभ सहित | लगभग 8.2% |
अलग-अलग बॉन्ड की तुलना केवल YTM से होती है। ख़रीदने से पहले सभी शुल्कों के बाद की YTM पूछें।
क़ीमत और यील्ड उल्टी दिशा में चलते हैं। बाज़ार दर 8% हो जाए तो 7% वाले बॉन्ड के लिए कोई ₹1,000 नहीं देगा — क़ीमत तब तक गिरेगी जब तक यील्ड 8% न हो जाए। यही ब्याज-दर जोखिम है और यह अवधि के साथ बढ़ता है: 1% दर बढ़ने पर 3 साल के बॉन्ड की क़ीमत लगभग 3% गिरती है, जबकि 20 साल के बॉन्ड की 12–15%।
"12% रिटर्न" वाले विज्ञापन से सावधान
उसी अवधि के सरकारी बॉन्ड से बहुत ऊँची यील्ड सस्ता सौदा नहीं, बल्कि डिफ़ॉल्ट जोखिम की क़ीमत है। 2026 में यदि 5-वर्षीय G-Sec ~6.8% दे रहा हो और कोई 12.5% दे रहा हो, तो आपको लगभग 5.7% सालाना इसलिए मिल रहा है कि पूँजी डूबने का वास्तविक ख़तरा है।
क्रेडिट रेटिंग सही तरीक़े से पढ़ना
CRISIL, ICRA, CARE, India Ratings और Brickwork जारीकर्ताओं को AAA से D तक ग्रेड देते हैं। यह पैमाना सीधी रेखा नहीं है — AA और BBB के बीच डिफ़ॉल्ट की संभावना का अंतर दो पायदान से कहीं ज़्यादा बड़ा है।
| रेटिंग | अर्थ | उदाहरण | रिटेल के लिए राय |
|---|---|---|---|
| AAA | सर्वोच्च सुरक्षा | SBI, HDFC Bank, NHAI, PFC | मुख्य होल्डिंग |
| AA / AA- | उच्च सुरक्षा | बड़ी NBFC, बड़े निजी जारीकर्ता | सीमित मात्रा में ठीक |
| A | पर्याप्त सुरक्षा | मध्यम NBFC | छोटी राशि, छोटी अवधि |
| BBB | मध्यम — निवेश ग्रेड की सबसे निचली सीढ़ी | छोटे वित्त/MFI से जुड़े NCD | रिटेल के लिए सट्टा |
| BB और नीचे | ऊँचा जोखिम | दबाव वाले जारीकर्ता | टालें |
| D | डिफ़ॉल्ट — भुगतान चूक चुका है | — | टालें |
- •रेटिंग एक तारीख़ की राय है, गारंटी नहीं — IL&FS डिफ़ॉल्ट से कुछ हफ़्ते पहले तक AAA था, DHFL भी।
- •अक्षर से ज़्यादा दिशा देखें: AA से A+ की गिरावट अपने आप में बड़ी चेतावनी है।
- •'प्रोविज़नल' या 'Issuer Not Cooperating (INC)' टैग ख़तरे का संकेत है — INC का मतलब है एजेंसी को जानकारी मिलनी बंद हो गई।
- •रेटिंग किसी एक इंस्ट्रूमेंट की होती है; कंपनी के NCD की रेटिंग उसके बैंक लोन से कम हो सकती है।
30 सेकंड की जाँच
कोई भी कॉर्पोरेट बॉन्ड लेने से पहले: रेटिंग और दो साल का उसका रुझान, सुरक्षित है या नहीं, जारीकर्ता का इंटरेस्ट कवरेज रेशियो, और यह एक जारीकर्ता आपके कुल पोर्टफोलियो का कितना हिस्सा बनेगा। कोई भी जवाब असहज लगे तो इसकी जगह G-Sec लें।
भारत में उपलब्ध बॉन्ड
| इंस्ट्रूमेंट | जारीकर्ता | अनुमानित यील्ड (2026) | मुख्य बात |
|---|---|---|---|
| ट्रेज़री बिल | भारत सरकार, 91–364 दिन | ~6.3–6.6% | क्रेडिट जोखिम शून्य; पैसा पार्क करने के लिए |
| G-Sec | भारत सरकार, 5–40 वर्ष | ~6.7–7.2% | सॉवरेन; दरों के साथ क़ीमत घटती-बढ़ती है |
| राज्य विकास ऋण (SDL) | राज्य सरकारें | ~7.0–7.4% | सॉवरेन जैसा, थोड़ी ऊँची यील्ड |
| PSU / AAA बॉन्ड | PFC, REC, NHAI, IRFC | ~7.2–7.7% | रिटेल के लिए सबसे संतुलित |
| टैक्स-फ्री बॉन्ड | पुराने NHAI/IRFC/PFC इश्यू | ~5.0–5.7% कर-मुक्त | सिर्फ़ सेकेंडरी बाज़ार; 30% स्लैब में बढ़िया |
| कॉर्पोरेट NCD | NBFC और कंपनियाँ | 8–11% | रेटिंग और सिक्योरिटी कवर पढ़ें |
| परपेचुअल (AT1) बॉन्ड | बैंक | 8–9% | कोई मैच्योरिटी नहीं; राइट-ऑफ़ हो सकता है |
| सॉवरेन गोल्ड बॉन्ड | भारत सरकार | 2.5% + सोने की क़ीमत | सोने का विकल्प, फिक्स्ड-इनकम नहीं |
परपेचुअल बॉन्ड FD नहीं हैं
AT1 बॉन्ड की कोई मैच्योरिटी तारीख़ नहीं होती और बैंक संकट में हो तो इन्हें शून्य कर दिया जा सकता है — 2020 में यस बैंक के ₹8,400 करोड़ के AT1 बॉन्ड राइट-ऑफ़ में हज़ारों रिटेल निवेशकों का पैसा डूबा, जिन्हें कहा गया था कि यह 'बेहतर ब्याज वाली FD जैसा' है। अब SEBI ने इन्हें मुख्यतः संस्थागत निवेशकों तक सीमित कर दिया है।
30% स्लैब वालों के लिए टैक्स-फ्री बॉन्ड फिर से देखने लायक़ हैं। 5.5% कर-मुक्त कूपन लगभग 7.9% कर-पूर्व के बराबर है — ज़्यादातर AAA टैक्सेबल बॉन्ड से बेहतर, वह भी सरकार-समर्थित जारीकर्ताओं के साथ। नए इश्यू बंद हैं, इसलिए इन्हें NSE/BSE पर ख़रीदना पड़ता है जहाँ वॉल्यूम कम रहता है — लिमिट ऑर्डर लगाएँ।
भारत में बॉन्ड कैसे ख़रीदें
- 1RBI Retail Direct (rbiretaildirect.org.in) — G-Sec, T-Bill, SDL और SGB सीधे ख़रीदें; कोई ब्रोकरेज नहीं, डीमैट की ज़रूरत नहीं।
- 2अपने ब्रोकर का बॉन्ड सेक्शन या SEBI-पंजीकृत ऑनलाइन बॉन्ड प्लेटफ़ॉर्म (OBPP) — ₹1,000 से कॉर्पोरेट और PSU बॉन्ड; केवल पंजीकृत OBPP ही इस्तेमाल करें।
- 3पब्लिक NCD इश्यू — ऑफ़र अवधि में डीमैट से आवेदन करें; रेटिंग और 'objects of the issue' ज़रूर पढ़ें।
- 4डेट म्यूचुअल फंड और टारगेट-मैच्योरिटी इंडेक्स फंड — एक ही जारीकर्ता के जोखिम की जगह पेशेवर रूप से प्रबंधित टोकरी; ज़्यादातर लोगों के लिए यही व्यावहारिक विकल्प है।
यदि आपका डेट हिस्सा लगभग ₹10 लाख से कम है, तो टारगेट-मैच्योरिटी इंडेक्स फंड या शॉर्ट-ड्यूरेशन डेट फंड आम तौर पर अलग-अलग बॉन्ड चुनने से बेहतर है: 30–60 जारीकर्ता, रोज़ाना तरलता और कूपन दोबारा निवेश करने का झंझट नहीं। अलग बॉन्ड तब लें जब किसी लक्ष्य की तारीख़ से मैच्योरिटी मिलानी हो, या टैक्स-फ्री बॉन्ड की कर-पश्चात यील्ड सचमुच बेहतर हो।
अवधि को लक्ष्य से मिलाएँ
2 साल बाद चाहिए पैसा 2-वर्षीय बॉन्ड या T-Bill में रखें, 15-वर्षीय G-Sec में नहीं। मैच्योरिटी तक रखने पर ब्याज-दर जोखिम बेमानी हो जाता है — बीच में क़ीमत कुछ भी रही हो, आपको फेस वैल्यू मिल जाती है।
पाँच जोखिम जो सचमुच नुक़सान करते हैं
- •क्रेडिट जोखिम — जारीकर्ता ब्याज या मूलधन चूक जाए। पूरा इलाज केवल सॉवरेन बॉन्ड हैं; व्यावहारिक इलाज है विविधीकरण और AA या ऊपर की रेटिंग।
- •ब्याज-दर जोखिम — दरें बढ़ें तो क़ीमत गिरे। मैच्योरिटी तक रखें तो कोई असर नहीं; बीच में बेचना पड़े तो नुक़सान।
- •तरलता जोखिम — छोटे कॉर्पोरेट बॉन्ड बीच में बेचना लगभग असंभव या 2–4% छूट पर ही संभव होता है। ख़रीदने से पहले ट्रेडेड वॉल्यूम देखें।
- •पुनर्निवेश जोखिम — 8% वाला बॉन्ड परिपक्व हुआ और अब बाज़ार 6% दे रहा है। 1/3/5/7 वर्ष की सीढ़ी (लैडर) इसे संतुलित करती है।
- •कॉल जोखिम — कुछ बॉन्ड जारीकर्ता समय से पहले वापस ले सकता है, और हमेशा तब जब दरें गिर चुकी हों।
एक ही जगह ज़्यादा पैसा लगाना साधारण जोखिम को आपदा बना देता है। डिफ़ॉल्ट हुए NCD में 5% हिस्सा एक बुरा साल देगा; 40% हिस्सा एक दशक छीन लेगा। किसी भी ग़ैर-सरकारी जारीकर्ता में कुल पोर्टफोलियो का 5% से ज़्यादा न रखें।
बॉन्ड पर टैक्स (FY 2026-27)
| आय | कर-व्यवहार |
|---|---|
| ब्याज / कूपन | आय में जुड़कर आपके स्लैब पर कर |
| टैक्स-फ्री बॉन्ड का ब्याज | धारा 10(15) के तहत पूरी तरह कर-मुक्त |
| लिस्टेड बॉन्ड, 12 माह बाद बिक्री | 12.5% LTCG, इंडेक्सेशन नहीं |
| लिस्टेड बॉन्ड, 12 माह के भीतर बिक्री | स्लैब दर |
| अनलिस्टेड / मार्केट-लिंक्ड डिबेंचर | हमेशा शॉर्ट-टर्म, स्लैब दर (धारा 50AA) |
| डेट म्यूचुअल फंड (अप्रैल 2023 के बाद ख़रीदे) | रिडेम्पशन पर स्लैब दर |
| SGB मैच्योरिटी तक रखा | पूँजीगत लाभ कर-मुक्त; 2.5% ब्याज कर-योग्य |
इसके दो व्यावहारिक नतीजे हैं। पहला, 30% स्लैब में 9% वाला टैक्सेबल NCD हाथ में लगभग 6.2% देता है — अक्सर 5.5% टैक्स-फ्री बॉन्ड से कम। हमेशा कर-पश्चात यील्ड की तुलना करें, कूपन की नहीं। दूसरा, डेट फंड से इंडेक्सेशन हटने के बाद बॉन्ड को मैच्योरिटी तक रखना या 3 साल के पैसे के लिए आर्बिट्राज/इक्विटी-सेविंग्स फंड चुनना कर-दृष्टि से बेहतर हो सकता है — अपने स्लैब पर गणना करें।
TDS
डीमैट में रखे लिस्टेड बॉन्ड से सालाना ₹10,000 से ऊपर ब्याज पर 10% TDS कटता है। यह अतिरिक्त ख़र्च नहीं, आपके अंतिम कर में समायोजित होता है — पर रिटर्न में पूरा ब्याज दिखाना ज़रूरी है।
जिन आम ग़लतियों से बचें
प्लेटफ़ॉर्म पर सबसे ऊँची यील्ड के पीछे भागना
सरकारी दर से ऊपर की यील्ड डिफ़ॉल्ट जोखिम का मुआवज़ा है, मुफ़्त पैसा नहीं। पहले रेटिंग से छाँटें, फिर यील्ड देखें।
NCD को FD समझ लेना
कॉर्पोरेट बॉन्ड पर ₹5 लाख का DICGC बीमा नहीं होता। कंपनी डूबी तो आप दिवालिया प्रक्रिया की क़तार में खड़े होते हैं।
छोटी अवधि के पैसे के लिए लम्बी अवधि का बॉन्ड
दरें 1% बढ़ें तो 20-वर्षीय G-Sec की क़ीमत 12% तक गिर सकती है। मैच्योरिटी को ज़रूरत की तारीख़ से मिलाएँ।
'असुरक्षित' और 'सबऑर्डिनेटेड' शब्द अनदेखा करना
डिफ़ॉल्ट में आपका नंबर यही शब्द तय करते हैं। सबऑर्डिनेटेड और परपेचुअल इंस्ट्रूमेंट सबसे आख़िर में — या कभी नहीं — चुकाए जाते हैं।
एक ही कंपनी के NCD में बड़ा हिस्सा
DHFL और IL&FS के निवेशकों ने यह महँगे तरीक़े से सीखा। किसी भी ग़ैर-सरकारी जारीकर्ता को पोर्टफोलियो के 5% तक सीमित रखें।
आपकी कार्य-सूची
- पहले तय करें कि पोर्टफोलियो का कितना हिस्सा डेट में जाएगा (एक आम नियम: उम्र के बराबर प्रतिशत)।
- G-Sec, T-Bill और SDL के लिए RBI Retail Direct इस्तेमाल करें — कोई ब्रोकरेज नहीं।
- कॉर्पोरेट बॉन्ड में AA या ऊपर ही रहें और दो साल का रेटिंग रुझान जाँचें।
- शुल्कों के बाद की YTM की तुलना करें, कूपन की नहीं; अपने स्लैब पर कर-पश्चात यील्ड निकालें।
- हर ग़ैर-सरकारी जारीकर्ता को कुल पोर्टफोलियो के 5% तक सीमित रखें।
- मैच्योरिटी को लक्ष्य की तारीख़ से मिलाएँ ताकि बीच की क़ीमत की चिंता न रहे।
- सेकेंडरी बाज़ार में ख़रीदने से पहले ट्रेडेड वॉल्यूम देखें और लिमिट ऑर्डर लगाएँ।
- परपेचुअल (AT1) और मार्केट-लिंक्ड डिबेंचर से तब तक दूर रहें जब तक राइट-ऑफ़ शर्त पूरी तरह समझ न आए।